मौसम और प्राकृतिक आपदाओं के पूर्वानुमान में असफल है आधुनिकविज्ञान ! जानिए क्यों ?

Category: Weather Published: Wednesday, 01 August 2018 Written by Dr S N Vajpayee

                                    आधुनिक विज्ञान का मौसम पूर्वानुमान है या मजाक !!

     न कोई अनुसंधान न कोई विज्ञान और न है कोई पूर्वानुमान न कोई प्रमाण न कोई आधार  ! मौसमी तीर तुक्कों पर सरकार खर्च कर रही है अनाप सनाप धनराशि !ऊपर से PM साहब कहते हैं कि हम देंगे जनता के धन की पाई पाई और पल पल का हिसाब !दें न उन्हें रोका आखिर किसने है ! 

     एक जगह आँधी उठी देखकर उसके आधार पर दूसरी आँधी आने की चेतावनी दे देने में या एक जगह बादल घिरे देखकर दूसरी जगह पानी बरसने की चेतावनी दे देने में विज्ञान कहाँ है ?भूकंपवैज्ञानिक उन्हें बताया जा रहा है जो डंके की चोट पर कहते हैं कि हमें भूकंपों के विषय में कुछ भी नहीं पता है फिर भी ये वैज्ञानिक हैं और खुश होकर सरकार ऐसे लोगों को देती है भारी भरकम सैलरी !आजादी से आजतक मौसम और भूकंप वैज्ञानिकों ने कभी कुछ खोज पाने में सफलता पाई हो तब न उनकी बातों पर भरोसा किया जा सके !अभी हाल में भूकंप वैज्ञानिकों के एक झुण्ड ने कहा कि निकट भविष्य में बड़ा भूकंप आने वाला है !मैं अनुसंधान पूर्वक प्रकृति को टटोलकर मैं विश्वास  से कह सकता हूँ कि इस समय प्रकृति के गर्भ में कोई बड़ा भूकंप नहीं पल रहा है !इन लोगों को इतना बड़ा झूठ बोलने की जल्दी न जाने क्यों थी !केवल इसीलिए कि इस बीच यदि कोई भूकंप आ गया तो ये वैज्ञानिक सिद्ध हो जाएँगे !कितना बचकानापन है ये ?आकाश में बादल देखकर कहते हैं आज पानी बरसेगा शायद कल भी बरसे !कुछ लोग कह रहे हैं कि परसों भी बरसेगा !बारे मौसम पूर्वनुमानी !
      भूकंप के विषय में बेचारे भूकंपवैज्ञानिक पहले ही कह चुके हैं कि हम कुछ नहीं बता सकते ! भूकंप के विषय में कुछ भी न जानने वालों को भी भूकंप वैज्ञानिक मानती है सरकारऔर उन पर लुटाती है लाखों रुपए की सैलरी !जनता का पैसा है अपना हो तो कलक लगे !जिस विषय में जो कुछ भी नहीं जानता वो उस विषय का वैज्ञानिक कैसे ?
       ये सच है कि ऐसे मौसम और भूकंप जैसे प्राकृतिक आपदाओं के धंधे से जुड़े लोग या तो किसी जन्म में जनता को कमा कर खिला चुके हैं सरकार से वो वसूल रहे हैं या फिर अब अपने ऊपर कर्जा चढ़ा रहे हैं जो आगे उतरेंगे !
     किसान पहले आत्म हत्या नहीं किया करते थे आज उन्हें आत्म हत्या करने के लिए मजबूर किसने किया ?इन्हीं मौसम संबंधी झूठी भविष्य वाणियों ने !जब आधुनिक मौसमविज्ञान के धंधे से जुड़े लोगों को मौसम संबंधी भविष्यवाणियों के नाम पर इतना झूठ साँच बोलने की अनुमति नहीं थी और वैदिक विज्ञान के द्वारा मौसम संबंधी सटीक पूर्वानुमान लगाए जाते थे तब किसान कहाँ किया करते थे आत्म हत्या ! ये तो आधुनिक मौसम विज्ञान की झूठी भविष्यवाणियों के दुष्प्रभाव हैं !

                         ये है वैदिक मौसम विज्ञान ये होगा बिल्कुल सच ! 


    

     पर्यावरण प्रदूषण आँधी तूफान वर्षा बाढ़ और भूकंप जैसी प्राकृतिक घटनाओं के घटित होने के वास्तविक कारणों को समझ पाने में आधुनिक विज्ञान अब तक असफल रहा है इनके कारणों को जाने बिना  इनका पूर्वानुमान लगा पाना संभव ही नहीं है यही कारण है 2016 में अत्यधिक आग लगने या गर्मी पड़ने एवं 2018 में अत्यधिक आँधी आने के कारणों के विषय में मौसम वैज्ञानिक कुछ भी कहने की स्थिति में नहीं हैं !आखिर ग्लोबल वार्मिंग और जलवायु परिवर्तन की आड़ में सच्चाई को कब तक और क्यों छिपाया जाए !
         किसी क्षेत्रविशेष में आँधी या बादलों का गुबार उड़ता हुआ देखकर हवाओं की दिशा और गति के आधार पर किसी देश प्रदेश में आँधी आने  या पानी बरसने की भविष्यवाणी कर देना !या फिर पंजाब में पराली जलाने से वायु प्रदूषण को जोड़ देना,धरती के अंदर भरी गैसों को भूकंप के लिए जिम्मेदार बता देना ऐसी थोथी बातों में  न तो पूर्वानुमान है  न विज्ञान है और न ही इसमें कोई अनुसंधान ही है !इनका कोई आधार ही नहीं है ऐसे तो आँधी की हवाएँ और वर्षा के बादल तो कभी भी गति और दिशा बदल सकते हैं !इसी प्रकार से भूकंप आने का कारण यदि धरती के अंदर भरी गैसों को मान लिया जाए तो मनुष्यों के कम्पन के लिए क्या उनके पेट में भरी गैस को जिम्मेदार मान लिया जाना चाहिए !          
      पर्यावरण पर अभी तक जो भी शोध  हुए हों क्या उनके द्वारा ये पता लगाया जा सकता है कि देश के किस भाग में वहाँ की जलवायु में संतुलन बनाए रखने के लिए किस प्रजाति के कौन कितने पेड़ लगाए जाने चाहिए कितने तालाब खोदे जाने चाहिए ,नहरें निकाली जानी चाहिए या झीलें बनाई जानी चाहिए तथा किस स्थान पर ये सब काम नहीं करने चाहिए !इस अनुसंधान के बिना कहीं यदि तालाब ,झील ,नहर आदि बना दिए जाते हैं या अन्य प्रकार के भारी निर्माण कार्य कर दिए जाते हैं तो उसे उस स्थान की प्रकृति स्वीकार कर पाती है तो ठीक अन्यथा उसका दुष्प्रभाव प्राकृतिक आपदाओं के रूप में उस क्षेत्र को झेलना पड़ता है !1967 में कोयना महाराष्ट्र में झील बनाई गई उसके बाद से वहाँ भूकंप अधिक आने लगे ! इसका मतलब उस स्थान पर बनी झील को  वहाँ की प्रकृति नहीं स्वीकार कर पाई !ये भूकंप उसी का दुष्प्रभाव थे !ऐसे ही प्रकृति में जहाँ कहीं जो कुछ भी है वो बहुत व्यवस्थित है उसका अकारण वजन घटाने या बढ़ाने से वहाँ गरमी या ठंढक अधिक पैदा कर देने से वहाँ की प्रकृति असंतुलित होती है जिससे उस क्षेत्र में प्राकृतिक आपदाएँ घटित होती हैं !इसलिए किसी भी बड़े निर्माण कार्य के पहले वहाँ की प्राकृतिक स्वीकार्यता पर अनुसंधान होना चाहिए !
     वर्षा बाढ़ आँधी तूफान आदि समस्त प्राकृतिक आपदाओं के विषय में महीनों पहले पूर्वानुमान लगाने के लिए आवश्यक है कि वहाँ की  प्रकृति से संबधित विभिन्न आयामों में दिखाई पड़ने वाले बदलावों एवं जीव जंतुओं के स्वभाव परिवर्तनों तथा समय विज्ञान के आधार पर अनुसंधान किया जाना चाहिए !उससे भावी प्राकृतिक आपदाओं के काफी सटीक पूर्वानुमान महीनों पहले प्राप्त किए जा सकते हैं !
     इसी वैदिक विज्ञान की प्रक्रिया से हम पिछले कई दशकों से पूर्वानुमान अनुसंधान  करते चले आ रहे हैं जो काफी सटीक होता है यदि सरकार इस अनुसंधान प्रक्रिया में रूचि ले और संसाधन उपलब्ध करवावे तो इसमें और अधिक सुधार किया जा सकता है और मैं सरकार के सक्षम मंच पर अपने प्रामाणिक आधारों अनुसंधानों पूर्वानुमानों को प्रस्तुत करने के लिए तैयार हूँ !अपने इस शोध कार्य के लिए हमें सहयोग की अपेक्षा है !   



 

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